یہ سوال آج دنیا کے ہر کونے میں پوچھا جا رہا ہے۔ اسکول میں پڑھنے والا طالب علم بھی یہی سوچتا ہے اور تیس سال سے نوکری کرنے والا تجربہ کار شخص بھی یہی ڈر محسوس کرتا ہے۔ لیکن سچ یہ ہے کہ اس سوال کا جواب اتنا سادہ نہیں جتنا لوگ سمجھتے ہیں اور نہ ہی اتنا پیچیدہ جتنا ماہرین بنا دیتے ہیں۔ آج میں آپ کو وہ حقیقت بتاؤں گا جو اعداد و شمار (Facts) اور تحقیق (Research) پر مبنی ہے — بغیر کسی مبالغے کے۔
آکسفورڈ یونیورسٹی (Oxford University) کی ایک مشہور تحقیق (Research) میں بتایا گیا کہ اگلے بیس سالوں میں سینتالیس فیصد (47%) موجودہ نوکریاں آٹومیشن (Automation) کی وجہ سے خطرے میں پڑ سکتی ہیں۔ یہ سن کر گھبرانا فطری ہے لیکن اسی تحقیق (Research) میں یہ بھی لکھا تھا کہ یہ وہ نوکریاں ہیں جن میں دہرایا جانے والا (Repetitive) کام ہوتا ہے۔ یعنی وہ کام جو ہر روز ایک جیسا ہو، جس میں سوچنے کی ضرورت کم ہو — وہ اے آئی (AI) کر سکتی ہے۔ لیکن جہاں تخلیق (Creativity)، جذبات (Emotions)، رشتے (Relationships) اور انسانی فیصلے (Human Judgment) کی ضرورت ہو — وہاں اے آئی (AI) ابھی تک انسان کا مقابلہ نہیں کر سکتی اور شاید کبھی نہ کر سکے۔
ورلڈ اکنامک فورم (World Economic Forum) کی 2024 کی رپورٹ (Report) کے مطابق اے آئی (AI) اگلے پانچ سالوں میں پچاسی ملین (85 Million) نوکریاں ختم کرے گی لیکن ساتھ ہی ستانوے ملین (97 Million) نئی نوکریاں بھی پیدا کرے گی۔ یعنی نیٹ فائدہ (Net Gain) بارہ ملین (12 Million) نوکریوں کا ہے۔ فرق صرف یہ ہے کہ یہ نئی نوکریاں ان لوگوں کو ملیں گی جو اے آئی (AI) کے ساتھ کام کرنا جانتے ہوں گے — نہ کہ ان کو جو اس سے ڈر کر بھاگتے رہے۔ تاریخ گواہ ہے کہ جب پرنٹنگ پریس (Printing Press) آئی تو لوگوں نے کہا کتابت کا پیشہ ختم ہو جائے گا — لیکن اس کے بجائے لاکھوں نئے پیشے پیدا ہوئے۔ جب انٹرنیٹ (Internet) آیا تو لوگوں نے کہا دکانیں بند ہو جائیں گی — لیکن ای کامرس (E-Commerce) نے کروڑوں نئے کاروبار کھول دیے۔ اے آئی (AI) بھی یہی کرے گی۔
تو جواب کیا ہے؟ اے آئی (AI) آپ کی جگہ نہیں لے گی — لیکن وہ انسان ضرور آپ کی جگہ لے گا جو اے آئی (AI) استعمال کرنا جانتا ہے۔ یہ ڈر کا وقت نہیں بلکہ سیکھنے کا وقت ہے۔ جو آج تیار ہو جائے گا کل اسی کا ہے۔
کیا آپ کو اے آئی (AI) سے ڈر لگتا ہے یا آپ اسے موقع سمجھتے ہیں؟ 💬 کمنٹ (Comment) میں بتائیں — سچ میں جاننا چاہتا ہوں۔ اگر یہ پوسٹ آپ کو سوچنے پر مجبور کر گئی تو ❤️ لائک (Like) کریں، کسی ایسے دوست کو 🔁 شیئر (Share) کریں جو یہ سوچتا ہے کہ اے آئی (AI) سب کچھ ختم کر دے گی اور 🔔 فالو (Follow) کریں کیونکہ اگلی پوسٹ میں بتاؤں گا کہ اے آئی (AI) کے دور میں اپنی نوکری اور کاروبار (Business) کو کیسے محفوظ رکھیں
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بہت سی غلطیاں ہوتی ہیں زندگی میں مگر جو غلطیاں لوگوں کو پہچاننے میں ہوتی ہیں ان کا خمیازہ سب سے زیادہ بھگتنا پڑتا ہے۔
تنویر خان ناصر 💕
कस्बे की पुरानी दुकानों में से सरदारजी की दुकान थी, जनरल स्टोर, स्पोर्ट्स के सामान और कॉपी-किताब की। एक छोटा लड़का गाँव से प्राइमरी के बाद पढ़ने के लिए कस्बे आया तो पिता ने उसे हॉस्टल में डलवा दिया। सरदारजी से उनकी पुरानी जान-पहचान थी! बच्चे को लेकर दुकान पर पहुँचे....
"मैं तो यहाँ नहीं रहूँगा। पर ये बच्चा अब आपके हवाले है। जिस चीज की जरुरत हो, दे दीजिएगा। हिसाब मैं आने पर करुंगा!"
"आप निश्चिंत होकर जाइये। सामान ही नहीं, पैसे-रुपये से लेकर कोई भी काम हो, मैं हूँ ना!"--सरदारजी ने आश्वस्त किया।
अब लड़के के हफ्ते में दो-चार चक्कर दुकान पर लगने शुरु हो गए। कभी कॉपी-कलम तो कभी टॉफी-बिस्किट तो कभी तेल-साबुन वगैरह!
हाँ, सब सामान ले चुकने के बाद चलते समय बच्चे के हाथ पर दो चॉकलेट धर देते...
"ये मेरी तरफ से!"
लगभग दो दशक बीत गये। पढ़ाई खत्म करने के बाद लड़का, जो युवा हो चुका था, बाहर नौकरी करने लगा!
पर छुट्टियों में जब भी गाँव आता, किसी न किसी काम से कस्बे जाना होता तो सरदारजी की दुकान का एक फेरा जरुर लगाता। वो चीजें, जो गाँव में भी आसानी से मिलती थीं, उन्हें सरदारजी की दुकान से लेता! प्रत्यक्ष तो नहीं कहता पर असल में वो अपने बचपन की यादों को ताजा करने पहुँचता था वहाँ!
उधर सरदारजी!
वो अब भी चलते समय उसके हाथ पर पहले की तरह चॉकलेट धर देते! एक बार तो उसने कहा भी....
"अब मैं बड़ा हो गया हूँ सरदारजी, अब भी चॉकलेट दे रहे हैं?"
सरदारजी ने एक लंबी साँस छोड़ी...
"अच्छे से जानता हूँ बाबू कि तुम यहाँ सामान लेने के बहाने स्मृतियों को ताजा करने आते हो! तुम क्या समझते हो, ये भावना बस तुम्हारे ही अंदर है! क्या उन स्मृतियों को जीने का हक मुझे नहीं! तुम्हारा मेरे यहाँ से सामान लेना और मेरा तुम्हें चॉकलेट देना तो बस एक बहाना मात्र है मिलने का, और ऐसे बहाने बनते रहने चाहिए जिंदगी में! समय के साथ बहुत कुछ छिन गया, पर इसी से कुछ बचा रह जाय तो ये सौदा सबसे मुनाफे का है जीने के लिए!"*
कस्बे की पुरानी दुकानों में से सरदारजी की दुकान थी, जनरल स्टोर, स्पोर्ट्स के सामान और कॉपी-किताब की। एक छोटा लड़का गाँव से प्राइमरी के बाद पढ़ने के लिए कस्बे आया तो पिता ने उसे हॉस्टल में डलवा दिया। सरदारजी से उनकी पुरानी जान-पहचान थी! बच्चे को लेकर दुकान पर पहुँचे....
"मैं तो यहाँ नहीं रहूँगा। पर ये बच्चा अब आपके हवाले है। जिस चीज की जरुरत हो, दे दीजिएगा। हिसाब मैं आने पर करुंगा!"
"आप निश्चिंत होकर जाइये। सामान ही नहीं, पैसे-रुपये से लेकर कोई भी काम हो, मैं हूँ ना!"--सरदारजी ने आश्वस्त किया।
अब लड़के के हफ्ते में दो-चार चक्कर दुकान पर लगने शुरु हो गए। कभी कॉपी-कलम तो कभी टॉफी-बिस्किट तो कभी तेल-साबुन वगैरह!
हाँ, सब सामान ले चुकने के बाद चलते समय बच्चे के हाथ पर दो चॉकलेट धर देते...
"ये मेरी तरफ से!"
लगभग दो दशक बीत गये। पढ़ाई खत्म करने के बाद लड़का, जो युवा हो चुका था, बाहर नौकरी करने लगा!
पर छुट्टियों में जब भी गाँव आता, किसी न किसी काम से कस्बे जाना होता तो सरदारजी की दुकान का एक फेरा जरुर लगाता। वो चीजें, जो गाँव में भी आसानी से मिलती थीं, उन्हें सरदारजी की दुकान से लेता! प्रत्यक्ष तो नहीं कहता पर असल में वो अपने बचपन की यादों को ताजा करने पहुँचता था वहाँ!
उधर सरदारजी!
वो अब भी चलते समय उसके हाथ पर पहले की तरह चॉकलेट धर देते! एक बार तो उसने कहा भी....
"अब मैं बड़ा हो गया हूँ सरदारजी, अब भी चॉकलेट दे रहे हैं?"
सरदारजी ने एक लंबी साँस छोड़ी...
"अच्छे से जानता हूँ बाबू कि तुम यहाँ सामान लेने के बहाने स्मृतियों को ताजा करने आते हो! तुम क्या समझते हो, ये भावना बस तुम्हारे ही अंदर है! क्या उन स्मृतियों को जीने का हक मुझे नहीं! तुम्हारा मेरे यहाँ से सामान लेना और मेरा तुम्हें चॉकलेट देना तो बस एक बहाना मात्र है मिलने का, और ऐसे बहाने बनते रहने चाहिए जिंदगी में! समय के साथ बहुत कुछ छिन गया, पर इसी से कुछ बचा रह जाय तो ये सौदा सबसे मुनाफे का है जीने के लिए!"*
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