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حضرت سلیمان فارسی رضی اللہ تعالی عنہا کا قول 💕علم اور عمل کے بارے میں:

"ایسا علم جس پر عمل نہ کیا جائے، وہ اس خزانے کی طرح ہے جسے چھپا کر رکھا جائے اور اس میں سے کچھ بھی خرچ نہ کیا جائے۔"

"बेटा आ गया तू!" दरवाज़े पर कूरियर वाले की बाइक की आवाज़ सुनते ही सत्तर साल के रामदीन काका अपनी लाठी टेकते हुए बरामदे में आ गए। मोतियाबिंद की वजह से उनकी आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी थी, लेकिन अपने कान के कच्चेपन के बावजूद वे इस एक आवाज़ को बहुत अच्छी तरह पहचानते थे।
कूरियर बॉय समीर ने अपनी बाइक का स्टैंड लगाया और एक खाकी रंग का लिफाफा और एक छोटी सी पार्सल की डिब्बी लेकर काका की तरफ बढ़ा। 
"प्रणाम काका! आपकी बेटी अंजलि का पार्सल और खत आया है शहर से।" समीर ने काका के कांपते हाथों में वह लिफाफा और डिब्बी थमा दी।
पार्सल हाथ में आते ही रामदीन काका का झुर्रियों भरा चेहरा खिल उठा। उन्होंने उस डिब्बी को अपने सीने से लगा लिया जैसे वह कोई बेजान वस्तु नहीं, बल्कि उनकी अपनी बेटी हो। 
"जीते रहो बेटा! ज़रा मेरी लाडो से बात तो करवा दे। पिछले महीने भी तूने बहुत जल्दी में फोन काट दिया था। मेरी उससे जी भर के बात नहीं हो पाई थी।" काका ने मिन्नत भरे स्वर में कहा।
समीर ने अपनी घड़ी की तरफ देखा और थोड़ी झिझक के साथ बोला, "काका, आज मुझे बहुत सारे पार्सल बांटने हैं। दीवाली का समय है, काम का बहुत दबाव है। आप पार्सल रख लीजिए, मैं फिर कभी तसल्ली से बात करवा दूंगा।"
"अरे बेटा, बस दो मिनट! मेरी बच्ची वहाँ बड़े शहर में अकेली है। उसकी आवाज़ सुने बिना मुझे ये दवाइयाँ भी असर नहीं करतीं।" काका की आवाज़ में एक पिता की तड़प थी जिसे समीर नज़रअंदाज़ नहीं कर पाया।
उसने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर डायल किया। फोन उठते ही उसने स्पीकर ऑन कर दिया और मोबाइल काका के कान के पास लगा दिया। 
"हैलो... बाबूजी! कैसे हैं आप?" उधर से एक लड़की की मीठी सी आवाज़ आई।
"मैं ठीक हूँ मेरी बच्ची। तू कैसी है? खाना समय पर खाती है ना? और ये हर महीने इतने पैसे और महँगी दवाइयाँ क्यों भेज देती है? मुझे अब इन सब की क्या ज़रूरत!" काका का गला रुंध गया था।
"बाबूजी, आप अपनी दवाइयों में लापरवाही मत किया कीजिए। मैं यहाँ बिल्कुल ठीक हूँ। अभी मेरी एक मीटिंग है, मैं आपको बाद में फोन करती हूँ। अपना ख्याल रखिएगा।" इतना कहकर उस लड़की ने फोन काट दिया।
फोन कटने के बाद भी काका कुछ सेकंड तक उस स्क्रीन को निहारते रहे जैसे उसमें अपनी बेटी का चेहरा तलाश रहे हों। फिर उन्होंने अपनी धोती के खूँट में बंधी एक छोटी सी पोटली खोली और कांपते हाथों से पचास रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट निकालकर समीर की तरफ बढ़ा दिया।
"यह क्या है काका?" समीर ने हैरानी से पूछा।
"रख ले बेटा। तू हर महीने इतनी दूर से मेरी लाडो का सामान लाता है, और मुझे उससे बात भी करवाता है। तेरे मोबाइल का भी तो बैलेंस कटता होगा। यह मेरी तरफ से मिठाई खा लेना।"
समीर ने लाख मना किया, लेकिन काका की ज़िद के आगे उसे वे पचास रुपये अपनी जेब में रखने पड़े। काका को ढेरों दुआएँ देते हुए वह अपनी बाइक की तरफ लौट गया।
समीर ने अभी अपनी बाइक स्टार्ट ही की थी कि मोहल्ले के नुक्कड़ पर मेडिकल स्टोर चलाने वाले शर्मा जी उसके पास आ गए। शर्मा जी पिछले कई मिनटों से यह सारा नज़ारा देख रहे थे।
"क्यों भाई समीर! यह क्या गोरखधंधा चला रखा है तुमने?" शर्मा जी की आवाज़ में सख्ती थी।
"कैसा गोरखधंधा शर्मा जी? मैंने क्या किया?" समीर हड़बड़ा गया।
शर्मा जी ने अपनी आँखें सिकोड़ते हुए कहा, "मुझे बेवकूफ मत बनाओ लड़के। मैं पिछले छह महीने से देख रहा हूँ। तुम हर महीने मेरी दुकान से रामदीन काका के नाम की दिल की बीमारी की दवाइयाँ खुद अपने पैसों से खरीदते हो। फिर उसे कूरियर के डिब्बे में पैक करते हो, उसमें अपनी जेब से कुछ पैसे डालते हो और यहाँ आकर काका को दे जाते हो। और तो और, नुक्कड़ वाले साइबर कैफे में काम करने वाली नेहा को तुमने थोड़े पैसे दे रखे हैं ताकि वह फोन पर काका की बेटी अंजलि बनकर उनसे बात कर सके। तुम यह सब नाटक क्यों कर रहे हो?"
शर्मा जी के तीखे सवालों ने समीर को निशब्द कर दिया। उसका राज़ खुल चुका था। उसने एक गहरी साँस ली और अपनी बाइक बंद कर दी।
"शर्मा जी... काका की बेटी अंजलि अब इस दुनिया में नहीं है," समीर की आवाज़ अचानक भारी हो गई। 
"क्या?" शर्मा जी चौंक पड़े। "लेकिन कैसे?"
"छह महीने पहले शहर की जिस फैक्ट्री में अंजलि काम करती थी, वहाँ एक भयंकर आग लग गई थी। उसी हादसे में अंजलि की मौत हो गई। फैक्ट्री वालों ने कुछ मुआवजे के पैसों के साथ एक चिट्ठी हमारे कूरियर ऑफिस के पते पर भेजी थी, ताकि रामदीन काका को सूचित किया जा सके।"
समीर की आँखें नम हो गई थीं। उसने आगे कहा, "जब मैं वह खत लेकर काका के घर पहुँचा, तो देखा कि वे अपनी बेटी की तस्वीर सीने से लगाए उसकी राह देख रहे थे। मैंने आस-पड़ोस से सुना था कि काका का दिल बहुत कमज़ोर है। अगर मैं उन्हें वह चिट्ठी थमा देता, तो वह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाते और उसी दिन टूट कर बिखर जाते। इसलिए मैंने वह चिट्ठी उन्हें कभी नहीं दी।"
शर्मा जी अब भी हैरान थे। "लेकिन समीर, तुम अपनी आधी पगार इस अजनबी बूढ़े पर क्यों खर्च कर रहे हो? नेहा को भी पैसे देते हो। तुम्हारा क्या स्वार्थ है इसमें?"
समीर की आँखों से एक आँसू छलक कर उसके गाल पर आ गिरा। उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, "शर्मा जी... कुछ साल पहले मैं भी शहर में पैसे कमाने गया था। मेरे बाबूजी गाँव में अकेले थे और बीमार रहते थे। मैं हमेशा सोचता था कि थोड़े पैसे और कमा लूँ, फिर बाबूजी के लिए शहर से अच्छी दवाइयाँ लेकर जाऊँगा। लेकिन जब तक मैं वापस लौटा... मेरे बाबूजी मुझे छोड़कर जा चुके थे।"
समीर ने अपनी जेब से काका का दिया हुआ वह मुड़ा-तुड़ा पचास रुपये का नोट निकाला और उसे चूमते हुए बोला, "जब रामदीन काका मेरे सिर पर हाथ रखकर मुझे दुआ देते हैं, तो मुझे लगता है जैसे मेरे बाबूजी ने मुझे माफ कर दिया है। मैं काका पर कोई एहसान नहीं कर रहा शर्मा जी, मैं तो इन चंद रुपयों से अपने हिस्से का सुकून खरीद रहा हूँ।"
समीर की बात सुनकर शर्मा जी की आँखें भी छलक आईं। उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचे थे। वह सिर्फ उस लड़के को देखते रहे जिसने एक अनजाने रिश्ते को खून के रिश्ते से भी ज्यादा पवित्रता से निभा दिया था। समीर ने अपनी बाइक स्टार्ट की और धूल उड़ाते हुए अगली गली में मुड़ गया, लेकिन पीछे छोड़ गया इंसानियत की एक ऐसी महक जो शायद कभी खत्म नहीं होगी।
***
**क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में जहाँ लोग अपने सगे माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, वहाँ समीर जैसे लोग इंसानियत की असली मिसाल हैं? क्या आपने कभी किसी अजनबी के लिए कोई ऐसा काम किया है जिससे आपके दिल को सुकून मिला हो? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।**

آپ کی گفتگو (Communication) کا معیار ہی آپ کے نتائج کے معیار کا تعین کرتا ہے۔


آپ جس انداز سے بات کرتے ہیں، اپنے خیالات بیان کرتے ہیں اور دوسروں سے رابطہ کرتے ہیں، اکثر ویسے ہی نتائج حاصل ہوتے ہیں۔اچھی بات چیت بہتر تعلقات، بہتر مواقع اور بہتر کامیابیوں
جو شخص زیادہ کماتا ہے، زیادہ حاصل کرتا ہے، اور زیادہ اثر و رسوخ رکھتا ہے،وہ ہمیشہ سب سے زیادہ ذہین نہیں ہوتا۔

اکثر فرق اس بات کا ہوتا ہے کہ اس نے اپنی ذات، اپنی صلاحیتوں اور اپنی ترقی پر زیادہ سرمایہ کاری کی ہوتی ہے۔ ✨

"کربلا""بحثیں نہ کیا کرو ، کربلا کا آپ کو پتہ ہی نہیں ہے کہ وہ کیا ہے۔آپ لوگوں کو یہ بھی پتہ نہیں کہ اگر آپ اس وقت ہوتے تو امام عالی مقام کے ساتھ ہوتے یا یزید کے ساتھ ہوتے، شکر کرو آپ اس وقت موجود نہیں تھے نہیں تو آپکو آزمائش پڑ جاتی۔ آپ کے لیے بہتر یہ ہے کہ آپ ماننے والوں کے قافلے میں رہیں۔"

_کبھی کبھی حقیقتوں کو برداشت کرنے کے لیے مضبوط نہیں بلکہ بے حس ہونا پڑتا ہے....! 🤌🏻_

 _دنیا اُن لوگوں کے لیے بہت ظالم ہے جو سب کچھ محسوس کرتے ہیں...! 💔🫠_  



If you're someone chasing your own quiet pursuit; a degree, a dream, a better version of yourself. I hope this page feels like company along the way. We don't have to be loud to make a difference. We just have to keep showing up.

I got back at a bully who tormented me in elementary school

Hello everyone



This happened more than 8 years ago or so, but it was more or less like this: I was in the 4th grade of elementary school, and there was a guy a year older than me who kept bothering me, saying I was weird and strange. I just kept holding a grudge against him, and he loved stealing my stuff. Seriously, he had stolen a lot of my things.


But there was a day when me and 7 other guys, I don't even remember who they were, we were playing fight, but it was just pushing each other on the school grass, and out of nowhere this guy came and started playing with us, and that morning he slapped me on the neck, which already made me furious when I saw him.


When we were resting for the second round, he was looking at a girl he liked, but he was near a slope full of dirt and lots of rocks. When I saw that, the first thing I did was wait for everyone who was playing to get to a separate place, and after that, I ran towards him and kicked him with both feet.


I saw him rolling around and I went into the bathroom and pretended I was peeing, and I could just hear him yelling really angrily, looking for who it was. When it was time to leave, I saw him all covered in dirt with his face bleeding and his clothes kind of torn, and I went home with a feeling of justice done. And after a few weeks, he dropped out of school, and to this day he doesn’t know it was me.

وقت کی قدرآج کا انسان زندگی کی ہر چیز حاصل کرنا چاہتا ہے، مگر ایک چیز ایسی ہے جو ایک بار چلی جائے تو واپس نہیں آتی، اور وہ ہے وقت۔ وقت اللہ تعالیٰ کی ایک عظیم نعمت ہے جس کی قدر کرنے والے ہی کامیاب ہوتے ہیں۔ دنیا کے تمام کامیاب لوگوں کی زندگی کا مطالعہ کیا جائے تو معلوم ہوتا ہے کہ انہوں نے اپنے وقت کو ضائع نہیں کیا بلکہ ہر لمحے کو کسی نہ کسی مفید کام میں صرف کیا۔افسوس کی بات یہ ہے کہ ہم اکثر وقت کی اہمیت اس وقت سمجھتے ہیں جب وہ ہمارے ہاتھ سے نکل چکا ہوتا ہے۔ گزرا ہوا لمحہ، بولا ہوا لفظ اور چھوٹا ہوا موقع کبھی واپس نہیں آتے۔ جو شخص وقت کی قدر کرتا ہے، وقت بھی اس کی قدر کرتا ہے۔زندگی مختصر ہے اور کرنے کے کام بہت زیادہ ہیں۔ اگر ہم روزانہ چند لمحے اپنے مقصد، اپنے کردار اور اپنی آخرت کے بارے میں سوچیں تو ہماری زندگی بدل سکتی ہے۔ کامیابی قسمت سے نہیں بلکہ صحیح وقت پر صحیح فیصلے کرنے سے حاصل ہوتی ہے۔آئیے آج عہد کریں کہ ہم اپنے وقت کو فضول کاموں میں ضائع نہیں کریں گے بلکہ علم حاصل کرنے، دوسروں کی مدد کرنے اور اپنی زندگی کو بہتر بنانے میں صرف کریں گے۔ کیونکہ وقت کی قدر کرنے والا انسان کبھی خسارے میں نہیں رہتا۔"وقت تلوار کی مانند ہے، اگر تم اسے نہ کاٹو تو وہ تمہیں کاٹ دے گا۔" 🕰️✨
محرم الحرام: اتحادِ امت اور اصلاحِ معاشرہ کی ضرورت
از قلم: سہیل اختر راؤ
اسلامی سال کا آغاز محرم الحرام سے ہوتا ہے۔ یہ مہینہ تاریخِ اسلام میں ایک منفرد مقام رکھتا ہے اور ہمیں صبر، استقامت، قربانی، حق گوئی اور اللہ تعالیٰ کی رضا کے لیے ہر آزمائش کا سامنا کرنے کا درس دیتا ہے۔ واقعۂ کربلا محرم الحرام کا وہ روشن باب ہے جس نے حق اور باطل کے درمیان فرق کو ہمیشہ کے لیے واضح کر دیا۔ حضرت امام حسینؓ اور ان کے رفقاء کی قربانی محض ایک تاریخی واقعہ نہیں بلکہ پوری امت کے لیے ایک دائمی پیغام ہے کہ ظلم، جبر اور ناانصافی کے سامنے سر جھکانے کے بجائے حق کا ساتھ دیا جائے۔
لیکن افسوس کے ساتھ یہ کہنا پڑتا ہے کہ گزشتہ چند دہائیوں میں محرم الحرام سمیت دیگر مذہبی مواقع پر ایسے بہت سے معاملات سامنے آئے ہیں جنہوں نے امتِ مسلمہ کو مزید تقسیم کیا ہے۔ محرم ہو، عید میلاد النبی ﷺ ہو یا دیگر مذہبی مواقع، وقت کے ساتھ ساتھ بہت سی ایسی رسومات اور روایات بھی جنم لیتی رہی ہیں جن کے بارے میں مختلف آراء موجود ہیں۔ ضرورت اس امر کی ہے کہ ہر عمل اور روایت کو قرآن و سنت اور مستند دینی تعلیمات کی روشنی میں پرکھا جائے تاکہ دین کی اصل روح برقرار رہے۔
میرا ذاتی مشاہدہ یہ ہے کہ آج ہماری قوم مختلف طبقات میں تقسیم دکھائی دیتی ہے۔ ایک طبقہ بعض روایات، نیازوں اور سبیلوں کو عقیدت اور ثواب کا اہم ذریعہ سمجھتا ہے۔ دوسرا طبقہ ان کی مخالفت کرتا ہے اور انہیں غیر ضروری قرار دیتا ہے۔ جبکہ ایک بڑی تعداد ایسی بھی ہے جو ان دونوں انتہاؤں کے درمیان کھڑی ہے اور اکثر الجھن کا شکار رہتی ہے۔ اس صورتحال میں ضرورت اس بات کی ہے کہ اختلافات کو نفرت اور دشمنی کا ذریعہ بنانے کے بجائے برداشت اور مکالمے کا راستہ اپنایا جائے۔
محرم الحرام کے دوران سبیلوں، نیاز اور لوگوں کو کھانا کھلانے کے عمل پر بھی مختلف آراء پائی جاتی ہیں۔ بعض علماء یہ سوال اٹھاتے ہیں کہ اگر یہ نیکی کا کام ہے تو سال کے دیگر دنوں میں اسی جذبے کے ساتھ کیوں نہیں کیا جاتا؟ بلاشبہ بھوکوں کو کھانا کھلانا، پیاسوں کو پانی پلانا اور اللہ کی راہ میں خرچ کرنا پورے سال کی نیکی ہے۔ تاہم یہ بھی حقیقت ہے کہ ہماری زندگی میں بعض ایام اور مہینے خصوصی اہمیت رکھتے ہیں۔ جس طرح رمضان المبارک روزوں، عبادات اور سخاوت کا مہینہ ہے، عیدین خوشی اور شکرگزاری کے مخصوص مواقع ہیں، اسی طرح محرم الحرام بھی اپنی ایک تاریخی اور روحانی نسبت رکھتا ہے۔ اگر کوئی شخص ان دنوں میں خدمتِ خلق کا جذبہ لے کر لوگوں کو پانی پلائے یا کھانا کھلائے تو اس کے مثبت پہلوؤں کو بھی دیکھا جانا چاہیے۔
ایک اور تشویشناک پہلو یہ ہے کہ بعض اوقات مذہبی اجتماعات اور منبروں سے ایسی گفتگو سننے کو ملتی ہے جو امت کے درمیان نفرت اور دوریوں کو بڑھاتی ہے۔ اسلام احترام، عدل اور حسنِ اخلاق کا دین ہے۔ اہلِ بیتِ اطہارؓ، صحابۂ کرامؓ اور اسلام کی دیگر مقدس شخصیات کے بارے میں گفتگو کرتے وقت انتہائی احتیاط، ادب اور ذمہ داری کا مظاہرہ کرنا چاہیے۔ تاریخ کے بعض واقعات صدیوں پرانے ہیں اور ان کی تمام تفصیلات کے بارے میں مختلف آراء موجود ہیں، اس لیے ایسے معاملات میں احتیاط اور سنجیدگی کا دامن ہاتھ سے نہیں چھوڑنا چاہیے۔
محرم الحرام کا مہینہ ہمیں صبر، استقامت، قربانی اور حق پر ثابت قدم رہنے کا درس دیتا ہے۔ افسوس کے ساتھ کہنا پڑتا ہے کہ آج ہم میں سے بعض لوگ محرم کی تعطیلات کو صرف سیر و تفریح اور انجوائے منٹ کا موقع سمجھتے ہیں۔ جیسے ہی چھٹیاں آتی ہیں، لوگ شمالی علاقہ جات یا دیگر تفریحی مقامات کا رخ کر لیتے ہیں۔ بلاشبہ سیر و تفریح انسان کی ضرورت ہے، لیکن ہمیں یہ بھی سوچنا چاہیے کہ محرم الحرام کی نسبت کس عظیم قربانی سے ہے۔ یہ مہینہ ہمیں خوشیوں اور تفریحی مصروفیات سے زیادہ غور و فکر، احتسابِ ذات اور واقعۂ کربلا کے پیغام کو سمجھنے کی دعوت دیتا ہے۔ ضرورت اس امر کی ہے کہ ہم ان ایام میں کچھ وقت حضرت امام حسینؓ اور ان کے جانثار ساتھیوں کی عظیم قربانیوں پر غور کرنے کے لیے نکالیں، اپنے کردار اور اعمال کا جائزہ لیں اور یہ سوچیں کہ اگر حق اور باطل کے درمیان انتخاب کا وقت آئے تو ہمارا کردار کیا ہوگا۔
محرم الحرام کا اصل پیغام یہ نہیں کہ ہم ایک دوسرے کے خلاف محاذ کھڑے کریں بلکہ یہ ہے کہ ہم اپنے کردار کا جائزہ لیں۔ اگر ہم جھوٹ، ناانصافی، تعصب، نفرت، خودغرضی اور فرقہ واریت جیسی برائیوں کو اپنی زندگی سے نکالنے کا عزم کر لیں تو یہی واقعۂ کربلا کے پیغام پر حقیقی عمل ہوگا۔
آج سب سے زیادہ ضرورت اس بات کی ہے کہ تمام مکاتبِ فکر کے جید علماء کرام، محققین اور مذہبی رہنما ایک پلیٹ فارم پر جمع ہوں اور ان نکات پر اتفاقِ رائے پیدا کریں جو قرآن، سنت اور مسلمہ دینی اصولوں سے ثابت ہیں۔ پھر انہی متفقہ اور مستند باتوں کو عام لوگوں تک پہنچایا جائے تاکہ امت مزید تقسیم ہونے کے بجائے قریب آ سکے۔ جن معاملات کی واضح شرعی یا تاریخی بنیاد موجود نہیں، ان پر علمی اور سنجیدہ گفتگو ہونی چاہیے تاکہ دین کی اصل تعلیمات محفوظ رہیں اور آنے والی نسلوں تک صحیح صورت میں منتقل ہوں۔
اسی طرح حکومت، علماء کرام، تعلیمی اداروں، میڈیا اور معاشرے کے تمام ذمہ دار طبقات کو مل کر ایسا ماحول پیدا کرنا چاہیے جس میں اہلِ بیتؓ، صحابۂ کرامؓ اور تمام مقدس شخصیات کے احترام کو یقینی بنایا جائے، نفرت انگیز گفتگو کی حوصلہ شکنی ہو اور باہمی احترام کو فروغ دیا جائے۔ مقصد کسی ایک مسلک یا گروہ کی برتری نہیں بلکہ امت کا اتحاد، دینی ہم آہنگی اور معاشرتی استحکام ہونا چاہیے۔
اگر ہم محرم الحرام کے پیغام کو سمجھ لیں، اختلافات کے باوجود ایک دوسرے کا احترام کرنا سیکھ لیں، اپنی توجہ مشترکہ اسلامی اقدار پر مرکوز رکھیں اور محرم کو محض ایک تعطیل کے بجائے اصلاحِ نفس اور فکری بیداری کا ذریعہ بنائیں تو یقیناً یہ مہینہ ہمارے لیے اتحادِ امت، اخلاقی تربیت اور ایک بہتر معاشرے کی تشکیل کا سبب بن سکتا ہے۔
اللہ تعالیٰ ہمیں حق بات سمجھنے، باہمی احترام کو فروغ دینے، اتحادِ امت کو مضبوط بنانے اور دینِ اسلام کی حقیقی تعلیمات پر عمل کرنے کی توفیق عطا فرمائے۔ آمین۔
از قلم: سہیل اختر راؤ

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