
@username
No bio available.
जब मुझे लगा था कि मैं बहुत समझदार हूँ
ज़िंदगी में कुछ सबक किताबों से नहीं मिलते, बल्कि एक छोटी-सी शर्मिंदगी इंसान को वह सिखा देती है जो बड़े-बड़े लेक्चर भी नहीं सिखा पाते। यह घटना मेरे छात्र जीवन की है।
उन दिनों मैं खुद को काफी समझदार समझता था। हर विषय पर अपनी राय देना अपना अधिकार मानता था, और अगर किसी की बात में ज़रा-सी भी गलती दिखती तो तुरंत उसे सुधारने के लिए तैयार हो जाता था। मुझे लगता था कि मैं लोगों को अच्छी तरह समझ लेता हूँ और कुछ ही मिनटों की बातचीत में किसी के बारे में सही राय बना सकता हूँ।
एक दिन मैं कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा था। सामने वाली मेज पर एक छात्र आया। उसके कपड़े ज्यादा साफ-सुथरे नहीं थे, बाल बिखरे हुए थे और हाथ में पुराने रजिस्टरों का एक बंडल था। वह काफी देर तक अलग-अलग किताबें खोलता, कुछ पन्ने देखता और वापस रख देता। उसे देखकर मैंने मन ही मन यह निष्कर्ष निकाल लिया कि शायद यह उन छात्रों में से है जो पढ़ाई से ज्यादा समय बर्बाद करने आते हैं।
कुछ देर बाद एक शिक्षक लाइब्रेरी में आए। मेरी हैरानी की सीमा नहीं रही जब वे सीधे उसी लड़के के पास गए, उसके कंधे पर हाथ रखा और बहुत सम्मान के साथ उससे बात करने लगे। फिर दोनों किसी विषय पर चर्चा में लग गए। मुझे जिज्ञासा हुई। बाद में पता चला कि वह छात्र न केवल अपनी कक्षा का एक उत्कृष्ट विद्यार्थी था, बल्कि आर्थिक तंगी के बावजूद कई दूसरे बच्चों को मुफ्त पढ़ाता भी था। पुराने रजिस्टर इसलिए थे क्योंकि वह नए खरीदने की स्थिति में नहीं था, और अलग-अलग किताबें इसलिए देख रहा था क्योंकि वह एक शोध प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा था।
यह सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे आत्मविश्वास के गुब्बारे से हवा निकाल दी हो। जिस व्यक्ति को मैं कुछ ही मिनटों के निरीक्षण के आधार पर गैर-गंभीर समझ रहा था, वह वास्तव में मुझसे कहीं ज्यादा मेहनती और प्रतिभाशाली निकला। उस दिन पहली बार मुझे गहराई से एहसास हुआ कि जानकारी होना और समझदार होना दो अलग बातें हैं। जानकारी इंसान को बोलना सिखाती है, जबकि समझदारी उसे निर्णय लेने में सावधानी सिखाती है।
इस घटना के बाद मैंने अपने आसपास के लोगों को अलग नजर से देखना शुरू किया। मुझे एहसास हुआ कि बहुत से शांत लोग अंदर से बहुत मजबूत होते हैं, बहुत से साधारण कपड़े पहनने वाले बहुत सम्मानित निकलते हैं, और बहुत से वे लोग जिन्हें हम मामूली समझते हैं, अपनी जिंदगी में ऐसी लड़ाइयाँ लड़ रहे होते हैं जिनका हमें अंदाजा भी नहीं होता।
आज सोशल मीडिया के दौर में यह समस्या पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। हम किसी की एक तस्वीर, एक पोस्ट, एक वाक्य या एक छोटी-सी वीडियो देखकर उसकी पूरी शख्सियत का फैसला सुना देते हैं। हम समझते हैं कि हमें सच्चाई पता है, जबकि अक्सर हमें सिर्फ दृश्य का एक छोटा-सा हिस्सा ही दिखाई देता है।
समय के साथ मैंने यह सीखा कि इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों, बोलने के तरीके, प्रसिद्धि या बाहरी रूप से नहीं होती। असली पहचान उसके चरित्र, नीयत और उन परिस्थितियों से होती है जो दूसरों की नजरों से छिपी होती हैं। जिंदगी का एक अहम उसूल यह है कि जल्दी फैसला करना आसान है, लेकिन सही फैसला करने के लिए धैर्य, समझ और न्याय की जरूरत होती है। क्योंकि कई बार जिस व्यक्ति को हम सबसे कम समझते हैं, वही हमें सबसे बड़ा सबक दे जाता है।
intoBlog - Write, Speak, Inspire