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اعلی حکام اور ارباب اختیار ضلع بہاول نگر سے درخواست ہے کہ منچن آباد کیلئے الیکٹرک بسوں کے روٹ کو فوری طور پر شروع کیا جاۓ کیونکہ روزانہ اسلامیہ یونیورسٹ کیمپس بہاول نگر اور نرسنگ کالج بہاول نگر جانیوالی بچیاں اور انکے والدین بڑے پریشان ہین۔ان طالبات کا بھرپور مطالبہ ہے کہ اس ایشو کو فوری طور پر حل کیا جاۓ اور ہمیں پریشانی سے نجات دلائی جاۓ 
"اگر تم بھول بھی جاؤ کہ تم نے خیر کا بیج کہاں بویا تھا ۔۔ تو بارش تمہیں بتا دے گی کہ تم نے کہاں بویا تھا ۔۔ کیوں کہ خوبصورت نقش باقی رہتے ہیں ۔۔ چاہے
एक आलीशान हॉल... सामने सैकड़ों लोगों की भीड़ और स्टेज पर खड़ा एक मशहूर मोटिवेशनल स्पीकर। अचानक उसने अपनी जेब से 500 रुपये का एक कड़क नोट निकाला और हवा में लहराते हुए पूछा,
​“यह 500 का नोट किसे चाहिए?”
​हॉल में बैठे लगभग हर शख्स का हाथ ऊपर उठ गया। हर कोई उसे पाना चाहता था।
​स्पीकर मुस्कुराया और बोला, “मैं यह नोट आप ही में से किसी एक को दूँगा, लेकिन ज़रा रुकिए, मुझे एक काम कर लेने दीजिए।”
​उसने उस कड़क नोट को अपनी मुट्ठी में भींचा और मरोड़कर एक कागज का गोला बना दिया। नोट पूरी तरह से सिकुड़ चुका था। उसने फिर पूछा, “क्या अब भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?”
​हॉल में एक बार फिर से सैकड़ों हाथ खड़े हो गए।
​“अच्छा! अगर मैं इसके साथ यह करूँ तो?” स्पीकर ने कहा। और उसने उस मुड़े हुए नोट को ज़मीन पर फेंक दिया और अपने जूतों से उसे बेरहमी से कुचलने लगा।
​जब उसने नोट को दोबारा उठाया, तो वह धूल से सना हुआ, गंदा और बुरी तरह कुचला हुआ था। वह फटने की कगार पर था।
​स्पीकर ने आखिरी बार पूछा, “क्या अब भी कोई है जो इस गंदे नोट को लेना चाहता है?”
​हॉल में सन्नाटा था... लेकिन पल भर में, एक बार फिर हवा में हाथ लहराने लगे। हर कोई अब भी उसे पाने के लिए तैयार था।​
​स्पीकर ने मुस्कुराते हुए कहा, “दोस्तों, आज आप सबने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा है। मैंने इस नोट को मरोड़ा, ज़मीन पर फेंका, जूतों से कुचला और इसे गंदा कर दिया। लेकिन इसके बावजूद आप इसे चाहते थे। क्यों?
​क्योंकि इस सब के बाद भी इस नोट की कीमत कम नहीं हुई। इसका मूल्य अब भी 500 रुपये ही था।
​ठीक इसी तरह, हमारी जिंदगी भी है। कई बार हम असफल होते हैं, हमारे फैसले गलत साबित होते हैं, लोग हमें धोखा देते हैं, या परिस्थितियां हमें मिट्टी में मिला देती हैं। हमें लगने लगता है कि हम बेकार हैं, हमारी कोई वैल्यू नहीं है।
​लेकिन याद रखिए... आपके साथ चाहे जो हुआ हो, या भविष्य में जो भी हो जाए, आपकी असल कीमत कभी कम नहीं हो सकती। आप ईश्वर की बनाई एक अनमोल रचना हैं। बीते कल की धूल को अपने आने वाले कल के सपनों को धुंधला मत करने दीजिए।”​
​क्या कभी किसी इंसान या किसी मोड़ पर मिली असफलता ने आपको यह महसूस कराने की कोशिश की है कि आपकी कोई कीमत नहीं है? आपने उस परिस्थिति का सामना कैसे किया? नीचे कमेंट में अपनी कहानी या विचार ज़रूर शेयर करें, क्योंकि आपकी एक कहानी किसी दूसरे टूटते हुए इंसान का हौसला बढ़ा सकती है!
#MoralStory #viralpost 

صبح بخیر 🌸

ہر صبح اللہ کی طرف سے ایک نیا موقع ہوتا ہے

شکر ادا کرنے کا بہتر بننے کا اور محبت بانٹنے کا۔

آج کا دن مسکراہٹ سے شروع کریں

اللہ پر بھروسہ رکھیں اور دل سے دعا کریں یا اللہ میرا آج کا دن خیر والا سکون والا اور رحمتوں سے بھرا ہو آمین 🤲

عمر بن الخطاب کے پاس ایک قاری نے یہ آیت تلاوت کی:﴿أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا﴾"کیا یہ لوگ قرآن میں غور و فکر نہیں کرتے، یا ان کے دلوں پر تالے پڑے ہوئے ہیں؟"
اس مجلس میں ایک نوجوان بھی موجود تھا۔ اس نے یہ آیت سن کر کہا:"اللّهم عليها أقفالها، ومفاتيحها بيدك، لا يفتحها سواك"“اے اللہ! بے شک دلوں پر تالے ہیں، اور ان کی کنجیاں تیرے ہی ہاتھ میں ہیں، تیرے سوا انہیں کوئی نہیں کھول سکتا۔”
حضرت عمر رضی اللہ عنہ نے اس کی یہ بات یاد رکھ لی، اور اس نوجوان کی قدر و منزلت ان کے دل میں اور بڑھ گئی۔
ابن القيم في شفاء العليل: (1/90)
عمر بن الخطاب کے پاس ایک قاری نے یہ آیت تلاوت کی:﴿أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَا﴾"کیا یہ لوگ قرآن میں غور و فکر نہیں کرتے، یا ان کے دلوں پر تالے پڑے ہوئے ہیں؟"
اس مجلس میں ایک نوجوان بھی موجود تھا۔ اس نے یہ آیت سن کر کہا:"اللّهم عليها أقفالها، ومفاتيحها بيدك، لا يفتحها سواك"“اے اللہ! بے شک دلوں پر تالے ہیں، اور ان کی کنجیاں تیرے ہی ہاتھ میں ہیں، تیرے سوا انہیں کوئی نہیں کھول سکتا۔”
حضرت عمر رضی اللہ عنہ نے اس کی یہ بات یاد رکھ لی، اور اس نوجوان کی قدر و منزلت ان کے دل میں اور بڑھ گئی۔

ابن القيم في شفاء العليل: (1/90)

میں حاجی فضل محمود انجم ایم اے ایم ایڈ سابق ایجوکیشنسٹ ہوں اور آجکل بطور کالم نگار اور آرٹیکل رائٹر ملک کے چند بڑے قومی و علاقائی اخبارات میں لکھ رہا ہوں۔میرے کالمز اور آرٹیکلز کا موضوع عوامی فلاح و بہبود اور انکے سماجی و معاشرتی مسائل ہوتا ہے ۔
बरसात का मौसम था। आसमान में काले बादल छाए हुए थे। सड़क पर लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों की ओर भाग रहे थे। तभी एक बूढ़ा आदमी बस स्टैंड के कोने में खड़ा दिखाई दिया। उसके हाथ में एक पुराना, जगह-जगह से सिला हुआ छाता था।लोग उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे।"आज के जमाने में भी ऐसा छाता कोई रखता है क्या?" एक युवक हंसते हुए बोला।बूढ़े आदमी ने कुछ नहीं कहा। बस अपने छाते को और मजबूती से पकड़ लिया।उसका नाम रामदास था।रामदास शहर में अकेला रहता था। उसकी पत्नी सरोज का पांच साल पहले निधन हो चुका था। एक बेटा था जो विदेश में बस गया था। शुरू-शुरू में फोन आता था, फिर महीने में एक बार, और अब तो कई-कई महीनों तक कोई खबर नहीं आती थी।उस दिन बारिश बहुत तेज हो रही थी।तभी बस स्टैंड पर लगभग दस साल की एक लड़की दौड़ती हुई आई। उसके कपड़े भीग चुके थे और हाथ में स्कूल बैग था।वह कांप रही थी।रामदास ने पूछा, "बेटी, घर नहीं जाना क्या?"लड़की बोली, "जाना तो है दादाजी, लेकिन मेरे पास छाता नहीं है। मां बीमार हैं। मुझे जल्दी घर पहुंचना है।"रामदास ने बिना कुछ सोचे अपना छाता उसकी ओर बढ़ा दिया।"लो बेटी, इसे ले जाओ।"लड़की चौंक गई।"और आप?""मैं थोड़ी देर बाद चला जाऊंगा।""लेकिन बारिश तो बहुत तेज है।"रामदास मुस्कुराया।"मेरी उम्र अब इतनी हो गई है कि थोड़ा भीग भी गया तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन तुम्हारी मां इंतजार कर रही होंगी।"लड़की छाता लेकर चली गई।बारिश रुक गई, लेकिन लड़की वापस नहीं आई।रामदास भी भीगता हुआ घर चला गया।अगले दिन भी वह उसी बस स्टैंड पर गया।शायद उसे उम्मीद थी कि लड़की छाता लौटा देगी।लेकिन वह नहीं आई।एक सप्ताह बीत गया।फिर एक महीना।छाता नहीं लौटा।मोहल्ले के लोग बोले, "देखा? आजकल कोई किसी का एहसान नहीं मानता।"रामदास बस मुस्कुरा देता।"कोई बात नहीं। शायद उसे जरूरत रही होगी।"असल में उसे छाते का दुख नहीं था।दुख इस बात का था कि उसे उस बच्ची की चिंता होने लगी थी।कई महीने बीत गए।फिर एक दिन रामदास को तेज बुखार हो गया।अकेला आदमी था। खाना बनाने की भी ताकत नहीं बची।तीन दिन तक वह बिस्तर से नहीं उठा।चौथे दिन दरवाजे पर दस्तक हुई।रामदास ने मुश्किल से दरवाजा खोला।सामने एक युवती खड़ी थी।उसके हाथ में दवाइयों का बैग था।रामदास उसे पहचान नहीं पाया।युवती मुस्कुराई।"दादाजी, पहचाना नहीं?"रामदास ने सिर हिलाया।तभी युवती ने अपने बैग से वही पुराना छाता निकाला।जगह-जगह से सिला हुआ।रामदास की आंखें फैल गईं।"तुम... वही लड़की?"युवती की आंखें भर आईं।"जी दादाजी।"रामदास हैरान रह गया।"लेकिन तुम तो छोटी बच्ची थीं।"वह मुस्कुराई।"दादाजी, वो पांच साल पुरानी बात है।"रामदास को याद आया।सचमुच पांच साल गुजर चुके थे।समय कितनी जल्दी निकल गया था।युवती बोली, "उस दिन मां बहुत बीमार थीं। मैं छाता लेकर घर पहुंची तो उसी रात मां को अस्पताल ले जाना पड़ा। फिर जिंदगी इतनी उलझ गई कि मैं आपको ढूंढ नहीं पाई।"रामदास चुपचाप सुनता रहा।"लेकिन मैंने आपका छाता संभालकर रखा। मां हमेशा कहती थीं कि जिसने मुश्किल समय में मदद की हो, उसका एहसान कभी मत भूलना।"रामदास की आंखों में नमी उतर आई।"फिर तुम्हें मेरा पता कैसे मिला?"युवती मुस्कुराई।"मैं अब नर्स बन गई हूं। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक मरीज ने आपका नाम लिया। तब पता चला कि आप इसी मोहल्ले में रहते हैं।"रामदास के गाल पर एक आंसू लुढ़क गया।पांच साल में पहली बार कोई उसके लिए कुछ लेकर आया था।युवती ने घर के अंदर नजर दौड़ाई।रसोई खाली थी।दवाइयां इधर-उधर पड़ी थीं।कमरे में अकेलापन बिखरा हुआ था।वह समझ गई कि रामदास कितनी तन्हाई में जी रहा है।उसने धीरे से पूछा,"दादाजी, आपका बेटा नहीं आता?"रामदास ने मुस्कुराने की कोशिश की।"बहुत दूर रहता है। व्यस्त होगा।"जवाब छोटा था, लेकिन दर्द बहुत बड़ा।युवती सब समझ गई।उस दिन वह खाना बनाकर गई।अगले दिन फिर आई।फिर उसके बाद भी आती रही।धीरे-धीरे रामदास के घर की खामोशी कम होने लगी।अब शाम को चाय के साथ बातें होती थीं।त्योहारों पर घर में मिठाई आने लगी।रामदास को पहली बार लगा कि वह अकेला नहीं है।एक दिन युवती अपने साथ अपनी मां को भी लाई।मां ने रामदास के पैर छुए।"भैया, उस दिन अगर आपने मेरी बेटी को छाता न दिया होता, तो शायद वह समय पर घर नहीं पहुंच पाती।"रामदास की आंखें भर आईं।वह बोला,"मैंने तो बस एक पुराना छाता दिया था।"महिला मुस्कुराईं।"नहीं भैया। आपने छाता नहीं दिया था... आपने उस दिन एक अनजान बच्ची की चिंता की थी। दुनिया में चीजों की कीमत नहीं होती, भावनाओं की होती है।"कुछ महीनों बाद रामदास का जन्मदिन आया।सालों बाद पहली बार उसके घर में केक कटा।मोमबत्तियां जलीं।हंसी गूंजी।रामदास कुर्सी पर बैठा सब देख रहा था।उसकी आंखें बार-बार नम हो रही थीं।क्योंकि उसे अपनी पत्नी की बात याद आ रही थी।वह अक्सर कहती थी—"दुनिया में किया गया कोई भी अच्छा काम कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह किसी न किसी रूप में लौटकर जरूर आता है।"आज वह बात सच साबित हो गई थी।जिस पुरानी चीज को लोग बेकार समझकर हंसते थे, वही पुराना छाता दो अनजान लोगों के बीच ऐसा रिश्ता बना गया था जो खून के रिश्तों से भी गहरा था।उस रात सोने से पहले रामदास ने उस छाते को अपने पास रखा।उसने आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा—"सरोज, तुम सही कहती थीं। इंसान की असली दौलत पैसे नहीं, उसके अच्छे कर्म होते हैं।"खिड़की के बाहर फिर हल्की बारिश शुरू हो गई थी।लेकिन इस बार रामदास के दिल में कोई अकेलापन नहीं था।क्योंकि उसे अपना परिवार मिल चुका था।और कभी-कभी...भगवान रिश्ते जन्म से नहीं देते, बल्कि एक छोटी सी नेकी के बदले उपहार में दे देते हैं। ❤️
الحمد للہ ❤️🤲

کوفہ مسلمانوں سے بھرا پڑا تھا، مگر مسلم صرف ایک تھا 

جب یزید بن معاویہ نے اقتدار سنبھالا اور عالمِ اسلام سے اپنی بیعت کا مطالبہ کیا تو امام حسینؑ نے اس بیعت سے انکار کر دیا۔ آپؑ کے نزدیک قیادت صرف اقتدار کا نام نہیں تھی بلکہ دین، عدل اور حق کی امانت تھی۔ اسی دوران کوفہ کے لوگوں نے امام حسینؑ کو ہزاروں خطوط لکھے۔ ان خطوط میں محبت، وفاداری اور نصرت کے وعدے تھے۔ انہوں نے لکھا کہ کوفہ آپؑ کا منتظر ہے، ہم آپؑ کے ہاتھ پر بیعت کریں گے، آپؑ کی حفاظت کریں گے اور ہر حال میں آپؑ کا ساتھ دیں گے۔




امام حسینؑ نے ان خطوط اور وعدوں کی حقیقت جاننے کے لیے اپنے چچا زاد بھائی اور داماد، حضرت مسلم بن عقیلؑ کو کوفہ روانہ کیا۔ حضرت مسلمؑ جب کوفہ پہنچے تو لوگوں نے ان کا شاندار استقبال کیا۔ ہزاروں افراد نے ان کے ہاتھ پر امام حسینؑ کی نمائندگی میں بیعت کی۔ ہر طرف وفاداری کے دعوے تھے، ہر زبان پر نصرت کے وعدے تھے اور ہر مجلس میں امام حسینؑ کی آمد کا ذکر تھا۔




حضرت مسلمؑ نے حالات کو سازگار دیکھ کر امام حسینؑ کو خط لکھا کہ کوفہ کے لوگ آپؑ کے منتظر ہیں اور آپؑ تشریف لا سکتے ہیں۔ بظاہر ایسا لگتا تھا کہ کوفہ حق کے استقبال کے لیے تیار ہے، مگر تاریخ نے ابھی اپنا اصل چہرہ دکھانا تھا۔




یزید نے حالات کی نزاکت کو بھانپتے ہوئے عبید اللہ بن زیاد کو کوفہ کا گورنر مقرر کر دیا۔ ابن زیاد نے کوفہ پہنچتے ہی خوف، دھمکی، جبر اور لالچ کا ایسا جال بچھایا کہ لوگوں کے دل بدلنے لگے۔ قبائلی سردار خرید لیے گئے، لوگوں کو ڈرایا گیا، گرفتاریاں ہوئیں اور اعلان کیا گیا کہ جو بھی مسلم بن عقیلؑ کا ساتھ دے گا، اس کی جان، مال اور خاندان محفوظ نہیں رہے گا۔




یہ وہ لمحہ تھا جب دعووں کا امتحان شروع ہوا۔




جو لوگ کل تک وفاداری کے نعرے لگا رہے تھے، وہ ایک ایک کرکے پیچھے ہٹنے لگے۔ جو ہاتھ بیعت کے لیے اٹھے تھے، وہ خوف سے جھک گئے۔ جو زبانیں حق کے حق میں بول رہی تھیں، وہ خاموش ہو گئیں۔ جو دروازے استقبال کے لیے کھلے تھے، وہ بند ہو گئے۔




تاریخ بیان کرتی ہے کہ ایک وقت حضرت مسلم بن عقیلؑ کے گرد ہزاروں افراد موجود تھے، مگر شام ہوتے ہوتے سب منتشر ہو گئے۔ کوئی جان بچانے کے لیے گھر میں چھپ گیا، کوئی خاندان کے خوف سے الگ ہو گیا اور کوئی دنیاوی مفاد کی خاطر خاموش ہو گیا۔




اس وقت کوفہ میں مسلمان ہزاروں تھے۔ مسجدیں آباد تھیں، اذانیں گونج رہی تھیں، قرآن پڑھا جا رہا تھا، مگر جب حق کا ساتھ دینے کا وقت آیا تو سب غائب ہو گئے۔




تب تاریخ نے ایک ایسا جملہ لکھا جو رہتی دنیا تک انسانیت کے لیے سبق بن گیا:




"کوفہ مسلمانوں سے بھرا پڑا تھا، مگر مسلم صرف ایک تھا۔"




مسلمان ہزاروں تھے، مگر مسلمانی ایک شخص میں باقی تھی۔




حضرت مسلم بن عقیلؑ تنہا رہ گئے، لیکن انہوں نے اپنے عہد سے وفا کی۔ نہ ابن زیاد کی دھمکیوں سے ڈرے، نہ تنہائی سے گھبرائے اور نہ حق کا راستہ چھوڑا۔ وہ شہر جس نے ہزاروں خطوط لکھے تھے، اسی شہر کی گلیوں میں مسلمؑ اکیلے رہ گئے۔




آخرکار ایک نیک خاتون، طوعہ، نے انہیں اپنے گھر میں پناہ دی، مگر جب حکومت کو ان کے ٹھکانے کا علم ہوا تو سپاہیوں کا لشکر انہیں گرفتار کرنے پہنچ گیا۔ حضرت مسلمؑ نے تن تنہا مقابلہ کیا اور بہادری کی ایسی مثال قائم کی جسے تاریخ آج بھی سلام کرتی ہے۔ مگر بالآخر انہیں گرفتار کر لیا گیا۔




9 ذوالحجہ 60 ہجری، یومِ عرفہ کے دن حضرت مسلم بن عقیلؑ کو شہید کر دیا گیا۔ وہ قافلۂ حسینؑ کے پہلے شہید تھے۔ ان کا خون دراصل کربلا کے میدان تک جانے والے راستے کا پہلا چراغ تھا۔




حضرت مسلم بن عقیلؑ کی شہادت ہمیں یہ سبق دیتی ہے کہ حق کا ساتھ دینا صرف نعروں کا نام نہیں، بلکہ قربانی، استقامت اور وفاداری کا نام ہے۔ وفاداری اس وقت نہیں آزمائی جاتی جب حالات سازگار ہوں، بلکہ اس وقت آزمائی جاتی ہے جب تلوار سر پر ہو اور پوری دنیا ساتھ چھوڑ چکی ہو۔




کوفہ کے ہزاروں لوگوں نے خطوط لکھے تھے، مگر تاریخ نے ان کے نام محفوظ نہیں رکھے۔ تاریخ نے صرف ایک نام محفوظ رکھا:




مسلم بن عقیلؑ۔




کیونکہ تاریخ تعداد نہیں گنتی، کردار گنتی ہے۔




اور اسی لیے آج بھی صدیوں بعد یہ حقیقت زندہ ہے کہ:




کوفہ مسلمانوں سے بھرا پڑا تھا، مگر مسلم صرف ایک تھا۔

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