एक शिक्षक के रूप में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जो आपको भीतर तक परेशान कर देते हैं।
हाल ही में मैं एक बच्चे के पास बैठा था। सामने लैपटॉप पर फिजिक्स का ऑनलाइन लेक्चर चल रहा था। देश के एक प्रसिद्ध स्टार टीचर पढ़ा रहे थे।
पहली नज़र में सब ठीक लग रहा था।
लेकिन कुछ देर बाद मैंने देखा कि कॉपी बंद पड़ी है। पेन मेज पर रखा है। कोई नोट्स नहीं बन रहे। कोई सवाल हल नहीं हो रहा।
बीच-बीच में मोबाइल उठता है। कभी गेम, कभी इंस्टाग्राम नोटिफिकेशन, कभी फुटबॉल वर्ल्ड कप का स्कोर।
फिर कुछ मिनट लेक्चर।फिर वापस मोबाइल।
काफी देर तक मैंने कुछ नहीं कहा। फिर मैंने बच्चे से कहा,
"बेटा, अगर तुझे मोबाइल पर गेम खेलना है तो लैपटॉप पर जो वीडियो चल रहा है उसे बंद कर दे और आराम से गेम खेल ले। कम से कम एक समय पर एक काम तो कर।"
बच्चा तुरंत नाराज़ हो गया।
उसका जवाब था,
"सर, पढ़ाई भी तो कर रहा हूँ!"
और यहीं आज की सबसे बड़ी समस्या छिपी हुई है।
बच्चे को सचमुच लगता है कि वह पढ़ रहा है।
उसे लगता है कि वह गेम भी खेल लेगा, सोशल मीडिया भी देख लेगा, मैच का स्कोर भी चेक कर लेगा और साथ में पढ़ाई भी हो जाएगी।
उसे विश्वास होता है कि बिना कॉपी खोले, बिना पेन चलाए, बिना सवाल हल किए, सिर्फ वीडियो लेक्चर देखते रहने से परीक्षा में अच्छे अंक आ जाएंगे।
एक शिक्षक के रूप में कई बार आप खुद को बेहद असहाय महसूस करते हैं।
आप समझा सकते हैं। टोक सकते हैं। बार-बार बता सकते हैं कि पढ़ाई देखने से नहीं, करने से होती है।
लेकिन एक सीमा के बाद आपकी विवशता शुरू हो जाती है।
क्योंकि बच्चा आपकी बात से असहमत नहीं होता, उसे सच में लगता है कि वह सब कुछ मैनेज कर लेगा।
दुर्भाग्य से प्रतियोगी परीक्षाएँ आत्मविश्वास नहीं, परिणाम देखती हैं।
और परिणाम केवल उन घंटों का नहीं होता जो स्क्रीन के सामने बिताए गए, बल्कि उन सवालों का होता है जो कॉपी में हल किए गए।